रोड लाइट मेंटेनेंस के नाम पर नगर पालिका में 30 लाख का स्काई लिफ्ट घोटाला, गुणवत्ता महज 10 लाख की
आबूरोड नगर पालिका में भ्रष्टाचार का एक और मामला सामने आया है। रोड लाइट मेंटेनेंस के नाम पर स्काई लिफ्ट खरीदने के लिए 30 लाख रुपये का टेंडर किया गया, जबकि सप्लाई की गई मशीन की वास्तविक लागत 10 लाख रुपये से अधिक नहीं है। मौके पर जो स्काई लिफ्ट दिखाई दे रही है, वह एक छोटे टेंपो (लगभग ₹5 लाख मूल्य के) पर 2-4 लाख रुपये का असेंबल लिफ्ट आइटम लगाकर तैयार की गई जुगाड़ प्रतीत होती है। इस भारी अंतर ने खरीद-प्रक्रिया और निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
*खरीद और हकीकत का फासला*
आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार नगर पालिका ने इस उपकरण के लिए 30 लाख रुपये का टेंडर निकाला और भुगतान किया। लेकिन स्थानीय निरीक्षण और जानकारों के मुताबिक सप्लाई हुआ सेटअप बाजार में आसानी से 8-10 लाख रुपये में तैयार हो सकता है—एक हल्का टेंपो बेस और सामान्य हाइड्रोलिक लिफ्ट अटैचमेंट। इतनी बड़ी राशि और जमीन पर दिख रहे साधारण उपकरण के बीच का फासला भ्रष्टाचार की ओर सीधा संकेत करता है। यह मामला हाल ही में मानपुर डंपिंग यार्ड पर 1 साल में 1 करोड़ रुपये खर्च के बावजूद कचरे के पहाड़ न घटने, और उसी यार्ड में आग लगने से उपजे धुएं-प्रदूषण प्रकरण के बाद आया है, जिससे नगर पालिका की कार्यप्रणाली पहले ही सवालों में है।
*प्रशासनिक पृष्ठभूमि और जवाबदेही*
नगर पालिका में पिछले दो महीने से IAS प्रशासक तैनात हैं, फिर भी वित्तीय अनियमितताओं और सेवा-गिरावट पर असर दिख नहीं रहा। मानपुर हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में कचरा संग्रहण-निस्तारण न होने की शिकायतों पर आश्वासन मिला था, लेकिन ज़मीनी काम ठंडे बस्ते में है। सात सौ परिवारों वाली उस कॉलोनी ने ज्ञापन दिया था, फिर भी डंपिंग यार्ड का विस्तार रुका नहीं। अब स्काई लिफ्ट खरीद मामले में तीन गुना अधिक भुगतान ने भरोसा और घटा दिया है।
*स्थानीय असर और जन-भावना*
आमजन का कहना है कि ऐसे खर्चों का खामियाज़ा सफ़ाई, रोशनी और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के रूप में चुकाना पड़ता है। वार्ड 1 आकराभट्टा में सरकारी अस्पताल के सामने 6 महीने पुरानी सीसी सड़क में दरार आना, मानपुर यार्ड की लगातार आग और उससे बुजुर्गों-बच्चों को सांस लेने में दिक्कत—इन सब घटनाओं ने नाराजगी बढ़ा दी है। लोग पूछ रहे हैं कि जब एक साधारण लिफ्ट पर 20 लाख रुपये अतिरिक्त जा सकते हैं, तो बुनियादी सुविधाओं के लिए बजट क्यों नहीं बचता।

नागरिकों और स्थानीय समितियों ने इस खरीद की स्वतंत्र जांच, टेंडर दस्तावेजों की सार्वजनिक समीक्षा और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है। यूआईटी-अनुमति और ग्राम पंचायतों के मार्फत काम करवाने के पुराने आश्वासन निष्फल रहे हैं; अब मॉनिटरिंग में तकनीकी ऑडिट, जियो-टैग्ड प्रगति रिपोर्ट और नागरिक निरीक्षण समिति का गठन ज़रूरी हो गया है ताकि मेंटेनेंस उपकरण, सीसी सड़कें और कचरा प्रबंधन जैसी मदों में पारदर्शिता आए। सवाल यही है—क्या IAS प्रशासक इस स्काई लिफ्ट घोटाले पर संज्ञान लेकर जवाबदेही तय करेंगी, या चुप्पी से भ्रष्टाचार को ढाल देती रहेंगी।
